chevron_left  अनार्यत्वमनाचारःarrow_drop_down
अनुशासन पर्व
अध्याय ४८
भीष्म उवाच
अनार्यत्वमनाचारः क्रूरत्वं निष्क्रिय़ात्मता |
४० क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय ३
युधिष्ठिर उवाच
अनार्यमार्येण सहस्रनेत्र; शक्यं कर्तुं दुष्करमेतदार्य |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३८
विदुर उवाच
अनार्यवृत्तमप्राज्ञमसूय़कमधार्मिकम् |
३२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४६
वासुदेव उवाच
अनार्यस्याकृतज्ञस्य लोभोपहतचेतसः |
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८४
भीष्म उवाच
अनार्या ये न जानन्ति समय़ं मन्दचेतसः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५९
भीष्म उवाच
अनार्यां शय़ने विभ्रदुज्झन्विभ्रच्च यो द्विजाम् |
२६ क
वन पर्व
अध्याय २३०
वैशम्पाय़न उवाच
अनार्याञ्शासतेत्येवं चित्रसेनोऽत्यमर्षणः ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय ३१
द्रौपद्यु उवाच
अनार्यान्सुखिनश्चैव विह्वलामीव चिन्तय़ा ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
अनार्याश्चार्यमासीनं पर्युपासन्न तत्र ह |
६४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
अनालव्धं जृम्भति गाण्डिवं धनु; रनालव्धा कम्पति मे धनुर्ज्या |
९६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६३
नारद उवाच
अनालोकेषु लोकेषु सोमवत्स विराजते ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३७
विदुर उवाच
अनाविलं चास्य भवेदपत्यं; न चैनमाद्यून इति क्षिपन्ति ||
३० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
अनावृतः सुविहितः स च यातु सुरक्षितः ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
अग्निरु उवाच
अनावृतगतिश्चैव कामचारी भवत्युत ||
६४ ख
आदि पर्व
अध्याय ११३
वैशम्पाय़न उवाच
अनावृता हि सर्वेषां वर्णानामङ्गना भुवि |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय ११३
वैशम्पाय़न उवाच
अनावृताः किल पुरा स्त्रिय़ आसन्वरानने |
४ क
वन पर्व
अध्याय २९१
सूर्य उवाच
अनावृताः स्त्रिय़ः सर्वा नराश्च वरवर्णिनि |
१५ क
वन पर्व
अध्याय १९४
मधुकैटभावू ऊचतुः
अनावृतेऽस्मिन्नाकाशे वधं सुरवरोत्तम ||
२६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
अनावृष्टिरनुप्राप्ता तदा द्वादशवार्षिकी ||
३० ख
शल्य पर्व
अध्याय ५०
वैशम्पाय़न उवाच
अनावृष्टिरनुप्राप्ता राजन्द्वादशवार्षिकी ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३९
भीष्म उवाच
अनावृष्टिरभूद्घोरा राजन्द्वादशवार्षिकी ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
अनावृष्टिर्महाराज जाय़ते वहुवार्षिकी ||
५६ ख
वन पर्व
अध्याय ११०
युधिष्ठिर उवाच
अनावृष्ट्यां प्रवृत्ताय़ां ववर्ष वलवृत्रहा ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय ११०
लोमश उवाच
अनावृष्ट्यां भय़ाद्यस्य ववर्ष वलवृत्रहा ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७९
भीष्म उवाच
अनाशकाग्न्योर्विशतां शूरा यान्ति परां गतिम् |
२८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४२
सूत उवाच
अनाशाय़ कृतं कर्म तस्य चेष्टः फलागमः |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय २४
श्रीभगवानु उवाच
अनाशिनोऽप्रमेय़स्य तस्माद्युध्यस्व भारत ||
१८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४९
व्रह्मो उवाच
अनाशीर्योगसंय़ुक्तास्ते धीराः साधुदर्शिनः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४८
शौनक उवाच
अनाश्चर्यं तदित्याहुर्नातिदूरे हि वर्तते ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
अनाश्चर्यं हि तत्त्वत्तस्त्वं हि पार्थ महारथः ||
४५ ख
आदि पर्व
अध्याय १२८
द्रुपद उवाच
अनाश्चर्यमिदं व्रह्मन्विक्रान्तेषु महात्मसु |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११५
सञ्जय़ उवाच
अनाश्चर्यो जय़स्तेषां येषां त्वमसि केशव |
६४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२३
सञ्जय़ उवाच
अनाश्चर्यो जय़स्तेषां येषां नाथोऽसि माधव |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय २८
श्रीभगवानु उवाच
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३६
विदुर उवाच
अनाश्रिता दानपुण्यं वेदपुण्यमनाश्रिताः |
५१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६२
कपिल उवाच
अनाश्रिताः पापकृत्याः कदाचित्कर्मय़ोनितः |
५ क
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
अनाश्रित्यैतदाख्यानं कथा भुवि न विद्यते |
२४० क
शान्ति पर्व
अध्याय २४७
भीष्म उवाच
अनाश्रय़मनालम्वमव्यक्तमविकारिता ||
७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
अनाशय़ेतां वलिनः पाञ्चालान्वै ततस्ततः |
५६ ख
आदि पर्व
अध्याय १९
सूत उवाच
अनासादितगाधं च पातालतलमव्ययम् ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १००
सञ्जय़ उवाच
अनासाद्य तु वार्ष्णेय़ं शक्तिः परमदारुणा |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९३
सञ्जय़ उवाच
अनासाद्य तु शैनेय़ं सा शक्तिः कालसंनिभा |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
अनास्तिकः श्रद्दधान एतत्पण्डितलक्षणम् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
अनास्तिकानास्तिकानां प्राणदाः पितरश्च ये |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५९
भीष्म उवाच
अनास्तिकेषु गोमात्रं प्राणमेकं प्रचक्षते ||
६९ ग
आदि पर्व
अध्याय ६९
शकुन्तलो उवाच
अनास्तिकोऽप्युद्विजते जनः किं पुनरास्तिकः ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय २०५
वैशम्पाय़न उवाच
अनास्तिक्यं च सर्वेषामस्माकमपि रक्षणे |
१५ क
विराट पर्व
अध्याय ४१
द्रोण उवाच
अनाहतश्च निष्क्रान्तो महद्वेदय़ते भय़म् |
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
अनाहता दुन्दुभय़ः प्रणदन्ति विशां पते |
२७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८१
वैशम्पाय़न उवाच
अनाहता दुन्दुभय़ः प्रणेदुर्मेघनिस्वनाः |
१५ क