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अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
अक्षय़ं च कुलं तेऽस्तु महर्षिभिरलङ्कृतम् ||
६९ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
अक्षय़ं च भवेद्दत्तं पितृभ्यस्तन्न संशय़ः |
९२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६५
भीष्म उवाच
अक्षय़ं नरकं यातीत्येवमाहुर्मनीषिणः ||
५० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
अक्षय़ं पुरुषं प्राहुः क्षय़ो ह्यस्य न विद्यते ||
४४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
उपमन्युरु उवाच
अक्षय़ं यौवनं तेऽस्तु तेजश्चैवानलोपमम् |
१९२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६५
भीष्म उवाच
अक्षय़ं सर्वदानानां तिलदानमिहोच्यते ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
अक्षय़त्वात्प्रजनने अजमत्राहुरव्ययम् |
४४ क
वन पर्व
अध्याय २१९
मार्कण्डेय़ उवाच
अक्षय़श्च भवेत्स्वर्गस्त्वत्प्रसादाद्धि नः प्रभो |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३९
व्रह्मो उवाच
अक्षय़श्चाप्रमेय़श्च सर्वगश्च निरुच्यते ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
अक्षय़श्चाव्ययश्चैव भविता दुःखवर्जितः |
६८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१८
भीष्म उवाच
अक्षय़श्चाव्ययश्चैव यत्र स्थास्यामि शाश्वतः ||
५१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९५
वैशम्पाय़न उवाच
अक्षय़श्चाव्ययश्चैव व्रह्मा लोकपितामहः |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२१
नारद उवाच
अक्षय़स्तव लोकोऽय़ं कीर्तिश्चैवाक्षय़ा दिवि |
७ ख
वन पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
अक्षय़ा तव कीर्तिश्च लोके स्थास्यति फल्गुन |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३८
वाय़ुरु उवाच
अक्षय़ा व्राह्मणा राजन्दिवि चेह च नित्यदा |
३ क
मौसल पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
अक्षय़ा हि पुरा भूत्वा क्षीणाः क्षतजभोजनाः ||
५९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६५
भीष्म उवाच
अक्षय़ाँल्लभते लोकान्नरः शतसहस्रदः ||
५२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
अक्षय़ाँल्लभते लोकान्भूमिसत्रं हि तस्य तत् ||
७९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९६
नारद उवाच
अक्षय़ाणि किलैतानि विवर्तन्ते स्म मातले |
१६ क
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
अक्षय़ान्प्राप्नुय़ाल्लोकान्कुलं चैव समुद्धरेत् ||
७३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६६
भीष्म उवाच
अक्षय़ान्समवाप्नोति लोकानित्यव्रवीन्मनुः ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय १३६
वालधिरु उवाच
अक्षय़ास्तन्निमित्तं मे सुतस्याय़ुर्भवेदिति ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७
भीष्म उवाच
अक्षय़ास्तस्य वै लोकाः सर्वकामगमास्तथा ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय ५६
वैशम्पाय़न उवाच
अक्षय़्यं तस्य तच्छ्राद्धमुपतिष्ठेत्पितृनपि ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
अक्षय़्यं वर्धते चान्नं तेन भोजय़ते द्विजान् ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
अक्षय़्यमन्नपानं तत्पितृंस्तस्योपतिष्ठति ||
२०३ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ५
सूत उवाच
अक्षय़्यमन्नपानं वै पितॄंस्तस्योपतिष्ठते ||
३६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
अक्षय़्यमभिधातव्यं स्वस्ति शूद्रस्य भारत ||
३७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
अक्षय़्यशरसंय़ुक्तो दिव्यास्त्रपरिवृंहितः ||
३० ख
विराट पर्व
अध्याय ५४
वैशम्पाय़न उवाच
अक्षय़्याविषुधी दिव्यौ पाण्डवस्य महात्मनः |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७४
भीष्म उवाच
अखण्डं सम्यगारव्धं तस्य लोकाः सनातनाः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८९
भीष्म उवाच
अखण्डमपि वा मासं सततं मनुजेश्वर |
४६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
अखादन्ननुमोदंश्च भावदोषेण मानवः |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५५
तुलाधार उवाच
अखिलं दैवतं सर्वं व्रह्म व्राह्मणसंश्रितम् |
१९ क
शल्य पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
अखिलं श्रोतुमिच्छामि कुशलो ह्यसि सञ्जय़ ||
६५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
अखिलां भोक्ष्यसे सर्वां पृथिवीं पृथिवीपते ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
अखिलां वुभुजे सर्वां पृथिवीमिति नः श्रुतम् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
अखिलाः पुरुषव्याघ्र गुणाः स्युर्यद्यपीतरे ||
४६ ख
वन पर्व
अध्याय २५१
जय़द्रथ उवाच
अखिलान्सिन्धुसौवीरानवाप्नुहि मय़ा सह ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय १६९
अर्जुन उवाच
अगच्छं परमामार्तिं मातलिस्तदलक्षय़त् ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय ४८
सूत उवाच
अगच्छच्छरणं भीत आगस्कृत्वा पुरन्दरम् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८३
पराशर उवाच
अगच्छञ्शरणं वीरं वहुरूपं गणाधिपम् ||
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
व्राह्मण उवाच
अगच्छत यथाकामं व्राह्मणश्छिन्नसंशय़ः ||
४८ ख
सभा पर्व
अध्याय ११
नारद उवाच
अगच्छत्तां सभां व्राह्मीं विपापां विगतक्लमाम् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय ६२
वृहदश्व उवाच
अगच्छत्तेन वै सार्धं भर्तृदर्शनलालसा ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय २२५
वैशम्पाय़न उवाच
अगच्छत्परमां तृप्तिं दर्शय़ामास चार्जुनम् ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय १०५
लोमश उवाच
अगच्छत्परमामार्तिं दार्यमाणः समन्ततः ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय १६४
अर्जुन उवाच
अगच्छत्स यथाकामं व्राह्मणः सूर्यसंनिभः ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय २९
सूत उवाच
अगच्छदपरिश्रान्त आवार्यार्कप्रभां खगः ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
अगच्छदसिमुद्यम्य शतचन्द्रं च भानुमत् ||
१३७ ख